Sunday, 30 September 2018


शब्द


शब्द जब उतरते हैं कागज़ पर
वो मात्र लाल , नीले ,काले रंगों में रंगे
अक्षर ही नहीं होते ।
वो बेचैनी है लेखक की ,
घुमड़न है तरल भावों की ।
तड़प है यथार्थ की ।
जो अकुला उठती है हृदय में
और…. विवश कर देती है लिखने को
लेखनी का दामन थाम लेने को।
अनगिनत जब्त पीड़ाएँ और दर्द
जो खामोश थे अब तक ।
बयां होने लगते हैं बेआवाज़
सधे हाथों से ।
आहिस्ता से मिट जाती है मैं और पर की दूरियाँ ,
सब समा जाता है हम में ।
और लेखनी रचती है नूतन संसार ।
जहाँ साझा होते हैं
कुछ पल अश्रुभरे ,
कुछ विवशताओं से परे ।
कुछ टूटे सपने
तो कुछ रूठे.अपने ।
आखरों कीजादूगरी खोलती बंद द्वार ।
करती है सोचने को विवश
कहीं यह मैं ही तो नहीं ….?
अरे , हाँ ….!
यह तो मेरे मौहल्ले , गली , नुक्कड़ , गाँव शहर
मेरे अपने ही देश का वो बंदा है ।
जो मुझसा ही
बस जिंदा है ।
टूटा , बिखरा पर मरा नहीं ,
संजोये अपनी आशाओं को आज भी ।
लेखकों की दुनिया में कर प्रवेश
मचाता है खलबली
उन्हें करता है विवश
कुछ अपरिचित रेखाओं में रंग भरने को ।
सुख -दुःख साझा करने को ,
जो सार्थक करते हैं शब्दों की परिभाषा को ।






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शब्द शब्द जब उतरते हैं कागज़ पर वो मात्र लाल , नीले , काले रंगों में रंगे अक्षर ही नहीं होते । वो बेचैनी है लेखक की , घुमड़न...